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बौध्द धर्म(धम्म) ही ब्राह्मण धर्म है""":"

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ब्राह्मण कृत बौद्ध धर्म ? 

बुद्ध ने कोई धर्म नही बनाया  , बौद्ध धर्म उनके अनुवाई ब्राह्मण शिष्यों द्वारा बनाया गया  ।

आप सब को यह पढ़ कर और सुन कर आश्चर्य हो सकता है  , किन्तु जव बौद्ध दर्शन के विभिन्न आयामो पर अध्ययन करेगे और उसकी उतपत्ति तथा उसके विस्तार का अवलोकन करेगे तो आप भी इस बात से इंकार नही कर पायेंगे की जिस बौद्ध धर्म की बात हम करते है या सुनते है , उसके संस्थापक बुद्ध नही बल्कि उनके ब्राह्मण शिष्य है। भगवान बुद्ध ने कही यह जिक्र नही किया है कि मैं पूर्वर्ती धर्म त्याग रहा हूं और नए धर्म का निर्माण कर रहा हूं , उन्होंने अपना धर्म स्पष्ट करते हुवे कई बार यह दर्शाया है कि मैं सनातन धर्म का हूं या मैं जिस धर्म की बात कर रहा हूं वह सनातन धर्म ही है।                "एसो धम्मो सनातनो"

"गौतम बुद्ध को बौद्ध धर्म का संस्थापक कहना और मानना उनके साथ अन्याय करने जैसा ही है  । भगवान बुद्ध एक सुधारवादी दृष्ष्टिकोण लेकर चले थे  , उनका पूरा जीवन तत्कालिक सामाजिक विकृति के सुधर पर केंद्रित रहा ,न की किसी नये धर्म का निर्माण कर समाज को पृथक करने का था  । बुद्ध जोड़ने आये थे फिर कोई…

मुर्खों के मनुवादी बुध्द(बाल्मिकी रामायण)

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आरोप क्या है? रामायण तथागत बुद्ध के बाद लिखी हुई एक कहानी है!....
 कैसे आरोप ?? .... यथा हि चोरः स तथा ही बुद्ध स्तथागतं नास्तीक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् स नास्तीके नाभि मुखो बुद्धः स्यातम् -अयोध्याकांड सर्ग 110 श्लोक 34 “जैसे चोर दंडनीय होता है इसी प्रकार बुद्ध भी दंडनीय है तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी यहाँ इसी कोटि में समझना चाहिए. इसलिए नास्तिक को दंड दिलाया जा सके तो उसे चोर के समान दंड दिलाया ही जाय. परन्तु जो वश के बाहर हो उस नास्तिक से ब्राह्मण कभी वार्तालाप ना करे! (श्लोक 34, सर्ग 109, वाल्मीकि रामायण, अयोध्या कांड.)” 👆👆👆....... इस श्लोक में बुद्ध-तथागत का उल्लेख होना हैरान करता है और इसके आधार पर मैं इस तर्क को अकाट्य मानता हूँ कि बुद्ध पहले हुए और रामायण की रचना बाद में की गई. उत्तर - यह जो प्रसंग चल रहा है इसमें यदि हम इस श्लोक से पहले के श्लोक की ओर देखें तो बुद्ध शब्द का प्रयोग किया गया है जो कि स्पष्ट रूप से गौतम बुद्ध के लिये नही है। इसी श्लोक की कड़ी में 34 नम्बर श्लोक आता है और इसमें बुद्ध शब्द का फिर से उपयोग किया गया है ठीक उसी सन्दर्भ में ज…

मौर्या:कालकेय

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जरूर पढ़े और शेयर करे ,, भोकिष्टो के दुष्प्रचार से समाज को बचाये,, शुवरो की गन्दगी समाज में न पनपने दे।।

दुर्गा सप्तशती वर्णित असुरों का मूल क्षेत्र -

 असुरों का मूल केन्द्र मध्य-युग में असीरिया कहा जाता था, जो आजकल सीरिया तथा इराक हैं। इसकी राजधानी उर थी, जो इराक का प्राचीनतम नगर है। महिषासुर के बारे में भी स्पष्ट लिखा है कि वह पाताल (भारत के विपरीत क्षेत्र) का निवासी  था। उसे चेतावनी भी दी गयी थी कि यदि जीवित रहना चाहते हो तो पाताल लौट जाओ-यूयं प्रयात पाताल यदि जीवितुमिच्छथ (दुर्गा सप्तशती ८/२६)। इसी अध्याय में (श्लोक ४-६) असुरों के क्षेत्र तथा भारत के सीमावर्त्ती क्षेत्रो के उल्लेख किये गए हैं   ।

                जहां असुरों का आक्रमण हुआ था-कम्बू-आजकल कम्बुज कहते हैं जिसे अंग्रेज कम्बोडिया कहते हैं। कोटि-वीर्य = अरब देश। कोटि = करोड़ का वीर्य (बल) १०० कोटि = अर्व तक है अतः इसे अरब कहते हैं। धौम्र (धुआं जैसा) को शाम (सन्ध्या = गोधूलि) कहते थे जो एसिया की पश्चिमी सीमा पर सीरिया का पुराना नाम है। शाम को सूर्य पश्चिम में अस्त होता है अतः एसिया की पश्चिमी सीमा शाम (सीरिया) है। इसी प्रका…

शाहबाजगढ़ी शिलालेख !!!

शाहबाजगढ़ी शिलालेखक्रमांकशिलालेखअनुवाद1.देवनं प्रिय प्रियद्रशि रय एवं हहित [।] नस्ति एदिशं दनं यदिशं ध्रमदनं ध्रमसंस्तवे ध्रंमसंविभगों ध्रमसम्बन्धों [।] तत्र एतं दसभटकनं संमपटिपति मतपितुषु सुश्रूष मित्रसंस्तुतञतिकनं श्रमणब्रहमनंदेवों का प्रिय प्रियदर्शी राजा इस प्रकार कहता है-जैसा धर्मदान, धर्म-संस्तव (धर्म-आचरण), धर्म संविभाग (धर्म का लेनदेन) वा धर्मसम्बन्ध है, ऐसा [और कोई] दान नहीं है। उसमें यह होता है-दास (और) भृत्य (नौकर) के प्रति सम्यक बर्त्ताव; माता-पिता की शुश्रूषा, मित्रों, संस्तुतों (प्रशंसितों या परिचितों), सम्बन्धियों, श्रमणों (और) ब्राह्मणों को2.दनं प्रणनं अनंरभो [।] एतं वतवों पितुन पि पुत्रेन पि भ्रतुन पि समिकेन पि मित्रसंस्तुतेन अव प्रटिवेशियेन इमं सधु इमं कटवों [।] सो तथ करंतं इअलोकं च अरेधेति परत्र च अनतं पुंञं प्रसवतिदान (तथा) प्राणियों का अनालंभ ( न मानना)। पिता, पुत्र, भ्राता, स्वामी, मित्र, संस्तुत (प्रशंसित), सम्बन्धी, यहाँ तक कि पड़ोसी से भी यह कहा जाना चाहिए-" यह उत्तम [है] यह कर्त्तव्य [है] ।" ऐसा करता हुआ वह [मनुष्य] इहलोक को सिद्ध करता है और उस धर्म…

शाहबाजगढ़ी शिलालेख !!

शाहबाजगढ़ी शिलालेख
क्रमांकशिलालेखअनुवाद1.अढवषाभिंसितस देवन प्रिअस प्रिअद्रशिस रञो कलिग विजित [।] दिअढमत्रे प्रणशतमहस्त्रे ये ततो अपवुढे शतसहस्त्रमत्रे तत्र हते बहुतवतके व मुटे[।]आठ वर्षों से अभिषिक्त देवों के प्रियदर्शी राजा से कलिंग विजित हुआ। डेढ़ लाख प्राणी यहाँ से बाहर ले जाये गये (कैद कर लिये गये), सौ हज़ार (एक लाख) वहाँ आहत (घायल) हुए; [और] उससे [भी] बहुत अधिक संख्या में मरे।2.ततो पच अधुन लधेषु कलिगेषु तिव्रे ध्र्मशिलनं ध्रमकमत ध्रमनुशस्ति च देवनं प्रियसर [।] सो अस्ति अनुसोचन देवनं प्रियस विजिनिति कलिगनि [।]अत्पश्चात् अब कलिंग के उपलब्ध होने पर देवों के प्रिय का धर्मवाय (धर्मपालन), धर्मकामता (धर्म की इच्छा) और धर्मानुशासन तीव्र हुए। सो कलिंग के विजेता देवों के प्रिय को अनुशय (अनुशोचन; पछतावा) है।3.अविजितं हि विजिनमनो यो तत्र वध न मरणं व अपवहों व जनस तं बढं वेदनियमंत गुरुमतं च देवनं प्रियस [।] इदं पि चु ततो गुरुमततरं देवनं प्रियस [।] व तत्र हिक्योंकि [मैं] विजित [देश] को अविजित ही मानता हूँ; यदि वहाँ जन (मनुष्यों) का वध, मरण वा अपवाह (कैद कर ले जाना) होता है। यह (वध आदि) देवों के …

शाहबाजगढ़ी शिलालेख !

शाहबाजगढ़ी शिलालेख
क्रमांकशिलालेखअनुवाद1.अयं ध्रमदिपि देवन प्रिअस रञे लिखापितु [।] हिद नो किचि जिवे अर [भि] तु प्रयुहोतवे [नो पि च समज कटव [।] बहुक हि दोषं सम [ज] स देवन प्रियो प्रिअद्रशि रय देखति [।]यह धर्मलिपि देवों के प्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी। यहाँ कोई जीव मार कर होम न करना चाहिए।2.अस्ति पि च एकतिए समये सधुमति देवन प्रिअस प्रिअद्रशिस रञे [।] पुर महनसिस देवनं प्रिअस प्रिअद्रशिस रञों अनुदिवसों बहुनि प्रणशतसहस्त्रनि अरभियिसु सुपठये [।] सो इदिन यद अयंकिंतु देवों के प्रिय प्रियदर्शी राजा से अच्छे (श्रेष्ठ) माने गये कतिपय समाज भी है। पहले देवों के प्रिय प्रियदर्शी राजा के महानस (पाकशाला में प्रतिदिन बहुत लाख प्राणी सूप (शोरबे, भोजन) के लिए मारे जाते थे। आज जब3.ध्रमदिपि लिखित तद त्रयो वो प्रण हञंति मजुर दुवि 2 म्रुगो 1 [।] सो पि म्रगो नो ध्रुवं [।] एत पि प्रण त्रयो पच न अरभिशंति [।]यह धर्मलिपि लिखी गयी, तब तीन ही प्राणी सूप (शोरबे, भजन) के लिए मारे जाते हैं- दो मोर (और) एक मृग और वह मृग भी ध्रुव (नियत, निश्चित) नहीं है। और ये तीन प्राणी भी पीछे न मारे जाएँगे।
क्रमांकशिलालेखअ…

पहले राम या बुध्द?

बौद्ध ,जैन दर्शन में राम ।

नवबौद्ध वर्तमान में समाज को दिग्भर्मित करने के लिए रोज तरह तरह के झूठ और प्रपञ्च फैलाते रहते है। इसी कड़ी में यह हिन्दू धर्म के सर्वमान्य भगवान राम के सम्बन्ध में दुष्प्रचार फैलाते रहते है। इस तरह के दुष्प्रचार से समाजिकता को कोई बल नही मिलता हाँ सामाजिक संरचना में दुराव और वैमनस्य जरूर फ़ैल रहा है।
यह लोग यह दावा करते फिरते है कि इतिहास में राम और कुश जैसा कोई पात्र पैदा नही हुवा है ये सिर्फ ब्राह्मणों की कल्पना है और मिथ्या है।

इसी में एक वर्ग कहता है की मौर्य वंश के अंत के बाद ब्राह्मणों ने ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र को राम और मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ को रावण के रूप में चित्रित किया है और मौर्य साम्राज्य के दस राजाओ को दशानन रावण की के रूप में प्रतुत किया है ।

फिर यही वर्ग राम को शम्भुक और सीता के साथ अन्याय करने वाला बता कर गालिया बकता है।
इनके तर्क और दलीले रोज रोज एक नई कहानी बनती है एक तरफ राम तथा कुश के अस्तित्व को ही नकार देते है  और दूसरी तरफ रावण को महान बौद्ध तो राम को हत्यारा और अन्यायी भी कहने लगते है।
जब अमुक पात्र काल्पनिक है कभी अस्तित्…